DSGMC प्रधान मनजिंदर सिंह सिरसा पर सिख मर्यादाओं के उल्लंघन का आरोप -सरना बंधुओ ने सिरसा पर उठाये कई सवाल

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भारत चौहान नई दिल्ली, पिछले तकरीबन आधा दशकों से जिस तरह से सिख मर्यादाओं के उल्लंघन की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं यह आने वाले सिख अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती हैं ।
दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमिटी (DSGMC) जो कि बादलों के रिमोट कंट्रोल से मनजिंदर सिरसा की अगुवाई में चलाई जा रही है ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रही है जो कि पूरी दुनिया में बसे सिखों को चिंतित करने लगी है।
सिख इतिहास के साथ बढ़ती छेड़छाड़ की घटनाएं आक्रोश के उबाल को बढ़ा रही है।

धर्म प्रचार का जिम्मा संभालने वाले मनजिंदर सिरसा कभी मीडिया को ही ननकाना साहिब और करतारपुर साहिब में अंतर बताने में विफल हो जाते है। तो कभी 8वीं पातशाही धन -धन श्री गुरू हरकिशन साहिब जी (बाला प्रीतम) से जुड़े इतिहास को बचकाना करके बताते है जिसका पूरी दुनिया में मजाक बनाया जाता है।
कभी गुरु साहिबान को क्वॉरेंटाइन करने के अपने थ्योरि को बताते है जिसकी शिकायत अकालतख्त साहिब तक पहुंचती है ।
ऐसी घटनाएं अब दिन प्रतिदिन की दिनचर्या मालुम होती है । अभी हाल ही में गुरुद्वारा श्री रकाब गंज साहिब के अंदर केक काटने और मीडिया के लोगों को बुलाकर “फ्लोरेंस नाइटेंगल” के जन्मदिन मनाना 550 सालों के प्रसाद बाँटने की प्रथा को ही खत्म करते हुए मालूम होते है।
अपने बड़बोलेपन और हास्यपद बयानों के लिए जाने जाने वाले पूर्व विधायक और वर्तमान DSGMC प्रधान ने जिस तरीके से धार्मिक संस्थाओं और गुरुद्वारा साहिब के गोल्ड रिजर्व जोकि श्रद्धालुओं के आस्था की निशानी होती हैं उनको सरकार को दान में देने का सुझाव दिया है ।अब इसने पुरानी हदों को तोड़ते हुए सिख जगत को झकझोर कर रख दिया है । दुनिया भर के आक्रोशित सिख ना सिर्फ अकाल तख्त साहिब बल्कि UN तक में जाकर अपनी शिकायते दर्ज करा रहे हैं ।

सिख मर्यादाओं के उल्लंघन की बढ़ती घटनाएं दो बड़े सवाल खड़ा करती हैं और दोनों के परिणाम भयवाह है :
1: क्या धर्म प्रचार का जिम्मा संभालने वाले को हो सिखी का तनिक ज्ञान नही है ?
यदि ऐसा है तो सिख बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए बुरी ख़बर होगी।

2 : क्या ये सारी घटनाएं एक साजिश के तहत की जा रही है जिससे कि सिख धर्म को अंदर से धीमे-धीमे खोखला कर दिया जाए ?

इन बढ़ती घटनाओं को इसलिए भी हल्के लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि कि धर्म से जुड़े विरोधाभास किसी भी कौम को बर्बादी की तरफ ढकेलते हैं और लोगों को नास्तिक बनाते हैं । सिख धर्म का मुख्य राजनीति से मिला होना भी लोगो को आस्था से दूर कर रहा है। सिख विद्वान तो अब यह भी सवाल करने लगे हैं की क्या सिख और सिखी कुछ स्वार्थी नेताओं के लिए बस कठपुतली बन कर रह चुके हैं ?
अभी हाल ही की कई बड़ी घटनाए इन सवालों को जायज ठहराते हुए दिखते हैं ।
दिल्ली के सिख कर्मचारी और अध्यापक जोकि सिरसा की अगुवाई में चलाए जा रहे हैं DSGMC के के अधीन काम कर रहे हैं चार -चार महीने से बिना तनख्वाह तड़पने को मजबूर है ।
गुरु घर के सेवक सरदार गुरुप्रीत सिंह (लकी) की कोरोना से मौत हो गई।
सुत्रों के अनुसार शहीद गुरप्रीत को बीमार होने के बावजूद जबरदस्ती लंगर बनवाने को मजबूर किया गया और तन्ख्वाह काटने की धमकी दी गई। कुछ दिन के अंदर ही उनके पिता की भी मौत हुई मगर सिख परिवार को कोई मुवावजा नहीं मिला।
सवाल यह रह कर छूट जाता है कि वाहवाही लूटने की राजनिति में इन नेताओं के लिए सिख और सिखी कहाँ है ?
क्या TV और सोशल मीडया के चकाचौंध की आड़ में सिख धर्म और इनकी मर्यादाओ को खोखला किया जा रहा है ?
इसके लिए जिम्मेदार कौन है ?
सोचना होगा !

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