रेलेव कोच में कोविड संक्रमितों का इलाज, पसीने छूट रहें है स्वास्थ्य अधिकारियों और सांस फूल रही है वॉरियर्स की! -कोविड डिब्बे में जैव शौचालय एवं ऑक्सीजन सिलेंडर भले हों, लेकिन गर्मी, उमस,घूटन से कैसे मिलेगी निजात

अपनी ही जान बचानी होगी मुश्किल, मानसून आने की बाट जो रहे हैं अधिकारी

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ज्ञानप्रकाश नई दिल्ली,वैश्विक महामारी कोरोना से जूझ रहे राजधानीवासियों को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद से यह तो तय है कि कोविड संक्रमितों की पहचान में महती भूमिका अदा करने वाले एंटीजेंन टेस्टिंग, बिस्तरों की संख्या, निजी अस्तालों में उपचार, टेस्टिंग प्रक्रियाओं में तीन गुना से अधिक कमी जैसी सहुलियतों से राहत मिल रही है। लेकिन इन्हीं राहतों के इतर केंद्र ने रेलवे की मदद से जो 500 बिस्तरों की सुविधा रेलवे कोच में दी है वह न तो मरीजों को सुट कर रहा है न ही जीवन बचाने में जुटे डाक्टर्स व अन्य फ्रंटलाइन वर्कर्स को ही। उनका कहना है कि यहां पर मरीज की जान बचाना तो दूर घूटन से हमारी ही सेहत बिगड़ने की पूरी पूरी संभावनाएं हैं।
धातु के डिब्बों, सूर्यदेवता का प्रकोप:
कोविड सुविधाओं का विस्तार करने में जुटे दिल्ली सरकार के स्वास्त्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हाथ वाले फव्वारे, मच्छरदानी, जैव-शौचालय, पॉवर सॉकेट, ऑक्सीजन सिलेंडर और कई अन्य सुविधाओं से लैस रेलवे के कोविड-देखभाल डिब्बों में मरीजों के आरामदायक उपचार के लिए लगभग सभी चीजें हैं लेकिन धातु के इन डिब्बों में वे शायद ही गर्मी झेल पाएंगे। रेलवे ने 5,321 गैर वातानुकूलित शयनयानों को हल्के लक्षण वाले और संदिग्ध मरीजों के लिए कोविड केयर लेवल 1 सेंटर में तब्दील किया है। संदिग्ध और सत्यापित मरीजों को अलग अलग डिब्बों में रखा जाएगा तथा पांच राज्यों में 960 डिब्बों को पहले ही तैनात कर दिया गया। उनमें से दिल्ली में 503 डिब्बे लगाए गए हैं। ये डिब्बे उपयोग में आने के लिए तैयार हैं लेकिन उन्हें लेने वाला कोई नहीं है। दो या उससे अधिक वातानुकूलित डिब्बे चिकित्साकर्मिंयों के आराम के लिए दिये जाएंगे। जून,जुलाई गर्म महीना है और देश के कई हिस्सों में यह सबसे गर्म महीना होता है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि मरीज आरामदेह कैसे रहें। स्वास्थ्य सेवाओं की महानिदेशक डा. नूतन मुंडेजा का मानना है कि मानसून आने के साथ कुछ राहत मिल जाएगी। अन्यथा ये डिब्बे व्यर्थ हो जाएंगे।
सुविधा जनक देने के लिए कई प्रयास:
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि इन गैर वातानुकूलित डिब्बों के इस्तेमाल की इजाजत दी थी लेकिन इन डिब्बों में तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है जो असहनीय हो जाता है। रेलवे इन डिब्बों के अंदर तापमान घटाने के लिए अब विकल्पों को आजमा रहा है। उनमें खिड़िकयों पर बांस की खपच्चियां लगाना, छत पर पानी की फुहार करना और उष्मारोधी लेप चढ़ाना या कूलर लगाना आदि शामिल हैं। उसने गर्मी को दूर रखने और डिब्बों के अंदर आरामदेह स्थिति बनाने के लिए उनके ऊपर कवर शीटों का भी इस्तेमाल किया है। इन उपायों से डिब्बे में तापमान एक डिग्री घट जाएगा। डिब्बों में माहौल को ठंडा बनाने के लिए भले ही कोशिश चल रही है लेकिन वे बारिश के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।

 

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