सुविधाओं की कमी और मंदी – रावण, मेघनाद, कुंभकरण के विशालकाय पुतले बनाने वाले कलाकार है परेशान

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ज्ञानप्रकाश
नई दिल्ली , विजयादशमी का पर्व अब करीब है। 8 अक्टूबर यानी मंगलवार को राजधानी में करीब एक हजार से अधिक छोटी बड़ी आयोजित रामलीलाओं में मंच पर राम रावण का वध करेंगे। इसके साथ ही लीला स्थलों पर जलाए जाने वाले असत्य पर सत्य के विजय रावण, कुंभकरण, मेघनाद के पुतलों को दहन किया जाएगा। लेकिन हिंदु पवरे में से एक इस सबसे बड़े उत्सव को पूर्ण करने में बीते दो से तीन माह से जुड़े कलाकारों के साथ ही पुतला का निर्माण करने वाले कारीगरों पर महंगाई की मार तो है ही साथ ही जहां पर वे इन पुतलों का निर्माण करने में रत है वहां पर प्रशासनिक असुविधाओं का अंबार है। इस उदासीनता के चलते वे खासे नाराज है।
सबसे बड़ा है पर्व:
तिताहर पुर स्थित दिल्ली नगर निगम के पार्क संख्या दो में करीब 500 से अधिक छोटे बड़े पुतलों को अन्तिम रूप दिया जा रहा है। रविवार को बीते 45 साल से पुतलों व्यवसाय से जुड़े मधेर राय कहते हैं कि मेरे पिता जी भी इसी कार्य में थे, महंगाई तो आसमान छू रही है। बांस, खपच्ची, लेई, पुतलों के निर्माण में इस्तेमाल किए जाने वाले इकोफ्रेंडली कागज, कपड़े, रुई, आतिशबाजी आदि की कीमते काफी महंगी है। लेकिन लीला कमेटी वाले वाजिब पैसा देने में दिलचस्पी लने लेते हैं। बमुश्किल से खर्च निकल पाता है। हमें चूंकि इस दिन का साल भर इंतजार रहता है, और कोई व्यवसाय नहीं है। हम भी विवश है उनकी मनमानी झेल रहे हैं। कुड़े के ढेर, चूहे की फौज इस पार्क के आसपास सहजता से देखी जा सकती है।
दीनानाथ (67) कहते हैं कि विदेशी मुल्क में पुतले भेजा गया है। लेकिन कीमते कम ही मिली। प्रशासनिक अव्यवस्था और मंदी की मार के चलते इस बार के दशहरे में इन पुतलों को बनाने वालों के लिये त्योहार का रंग कुछ फीका सा है। दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली मुख्य सड़क से दूर, मंद रोशनी में पश्चिमी दिल्ली के सुभाष नगर में पुतला बाजार सज चुका है। 2018 से पहले यह बाजार टैगोर गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास तितारपुर गांव में लगा करता था, जिसे अब सुभाष नगर स्थानांतरित कर दिया गया है। पुतला निर्माण से जुड़े कलाकारों का कहना है कि कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होने होने के कारण कारोबार और जीवन दोनों पर मार पड़ी है।
एशिया का है सबसे बड़ा पुतला बाजार:
दिल्ली के तितारपुर पुतला बाजार को एशिया में अपनी तरह के सबसे बड़े बाजार में से एक माना जाता था, जहां दशहरा से कुछ दिन पहले से ही इसके व्यस्त बाजार में बड़े-बड़े सिर वाले रावण के रंग-बिरंगे पुतले सड़क पर एक कतार में खड़े दिखायी देने लगते थे। हालांकि अब पुतला बनाने वाले कलाकारों को जिन दो जगहों पर भेजा गया है वहां सुविधाओं के नाम पर सिर्फ बड़ी-बड़ी घास के मैदान हैं।
पानी भर गया:
बीते दिनों हुई बेमौसमी बारिश से पुतले क्षतिग्रस्त हो गए। कारीगर राजेर यादव कहते हैं वहां न पानी है, न बिजली है और न शौचालय की सुविधा है। ये कलाकार अपनी साल भर की बेहद कम मेहनताना वाली नौकरियों को छोड़कर त्योहारी मौसम में कुछ अतिरिक्त धन कमाने की उम्मीद से पुतले बनाते और बेचते हैं। बहरहाल, इन सबके बावजूद ये कलाकार लंबे और दस सिर वाले शक्तिशाली रावण तथा उसके भाइयों कुम्भकर्ण और मेघनाद के पुतलों को अंतिम रूप देने में जुटें हैं। हमें पर्याप्त आय होने की उम्मीद कम है।
जितने ऊंचे पुतले उतनी कीमत:
ये पुतले पांच फीट से करीब 50 फीट के होते हैं। जितने पुतलों की ऊंचाई रहती है उसी के हिसाब से कीमत वसली जाती है। इनकी कीमत प्रति फीट 400 से 500 रुपये है जो पिछले सालों के मुकाबले कम है। ये कलाकार मुख्यत: राजस्थान, हरियाणा और बिहार से दिहाड़ी मजदूर होते हैं। ऐसे ही एक कारोबारी भूवनेश उर्फ कुंभ कहते हैं कि जब हम यहां आये तो अधिकारियों ने हमें शौचालय, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया था। अब हम ऐसी जगह पुतले बना रहे हैं जो जंगल से भी बदतर है। कमाई तो दूर, हमें पीने के पानी के लिये हर दिन 300-400 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जो थोड़ी बहुत रोशनी दिख रही है उसकी व्यवस्था भी हमने ही की है और इसके लिये हमने 2 हजार रुपये खर्च किये। बीते 45 साल से पुतले बना रहे हैं।
नियम के तहत ही शुल्क:
बाजार के लिये आवश्यक सुविधाओं की कमी के बारे में बारे में पूछे जाने पर दक्षिण दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी) के पूर्व महापौर श्याम शर्मा ने कहा कि नियम के तहत शुल्क व सुविधाएं प्रदान की जाती है। समस्या है तो उसे दूर करेंगे।

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