कैट्स सेवाएं बनी जानलेवा, चार दिन से फ्यूल नहीं, 70 फीसद एम्बुलेंस सड़कों पर हैं खड़ी -फर्स्ट एड, आक्सीजन जैसी जीवनरक्षक सेवाएं नदारद

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ज्ञानप्रकाश नई दिल्ली , करीब दो करोड़ की आबादी वाली राजधानीवासियों की लाइफ लाईन मानी जाने वाली केंद्रीयकृत सद्मा एवं सुश्रुत सेवाएं (कैट्स) एम्बुलेंस अपने उद्ेश्यों से भटक गई है। सूरतेहाल यह है कि दिल्ली सरकार के रिकार्ड में 265 कैट्स एम्बुलेंस है। लेकिन सड़क पर इनमें से मुश्किल से 30 फीसद ही चल पा रही है। बीते चार दिनों से ईधन न मिलने की वजे से 70 फीसद एम्बुलेंस जहां तहां सड़कों पर ही खड़ी कर दी गई है। जिससे फ्यूल नहीं मिलने से कम से 700 से ज्यादा प्रतिदिन आने वाली जरूरी हेल्प काल्स को अटेंड नहीं किया गया। नियंतण्रकक्ष के नंबर आउट आफ आर्डर है। कुछ अधिकारियों के मोबाइल नंबर पर जब लोगों ने फोन किए तो वे भी यही कहते हुए टरका दिया कि हम इलेक्शन ड्यूटी में व्यस्त हैं। कंट्रोल कक्ष में ही फोन करो। कुछ लोग तो लक्ष्मी नगर कैट्स के केंद्रीय कक्ष तक पहुंच गए। हेल्पलाइन नंबर 102 और 1099 पर कोई अटेंड नहीं कर रहा है। चूक वस यदि किसी ने उठा भी लिया तो कहा गया कि फिलहाल कैट्स एम्बुलेंस व्यस्त है, असुविधा के लिए हमें खेद है, अत: खुद अपनी मदद करे। अनुमान है कि हर दिन 700 से अधिक हेल्पलाइन पर मदद के लिए काल्स आती है। फस्र्ट एड, आक्सीजन भी नहीं है।
दिक्कत की जड़ है निजीकरण:
इस अव्यवस्था के पीछे कैट्स कर्मचारी प्रशासन को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में आप सरकार काबिज होने के बाद इस अति गोपनीय सेवाओं को निजी हाथों में सौंप दिया। वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने उन्हें कैट्स के निजीकरण नहीं होने का वादा किया था। लेकिन कुर्सी संभालते ही सरकार ने पहले बीबीजी फिर कुछ साल बाद ही एमरी नामक एजेंसी को दे दिया गया। पिछले 20 माह से कर्मचारी यूनियन ठेका प्रथा का विरोध कर रही है। इसके लिए 72 दिनों की अनिश्चित कालीन हड़ताल भी की। वेतन तो दे दिए गए लेकिन निजीकरण प्रक्रिया अब भी जारी है।
हालत है दयनीय:
कैट्स में कुल 265 एंबुलेंस ( ईको और फोर्स एडवांस लाइफ स्पोर्ट) हैं, इनमें से 70 फीसद गाड़ियों के सायरन सहित तमाम तकनीकी उपकरण खराब हैं। एयर कंडीशन ठप्प पड़े है। आक्सीजन निल है। फस्र्ट एड्स नहीं है। कैट्स एंबुलेंस के लिए विभाग द्वारा ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि एंबुलेंस में संक्रमण होने पर कीटाणु रक्षित सफाई कराई जा सके। एंबुलेंस को एक साल से इंडेंट (प्राथमिकी सहायता में प्रयोग किया जाने वाला सामान) नहीं दिया जा रहा है। अभी तक प्रति माह एक एंबुलेंस पर एक लाख खर्च। लेकिन ठेका प्रथा से यह खर्च एक लाख 40 हजार हुआ।
गड़बड़ ही गड़बड़:
कैट्स कर्मचारी यूनियन के महासचिव अजीत डबास कहते हैं कि एंबुलेंस की दुर्दशा के जिम्मेदार वे अधिकारी हैं, जिन पर सरकार भरोसा करके बैठी है। कुछ ही समय पहले वित्तीय विभाग ने रिकवरी भी डाली, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में चला गया। कैट्स के प्रशासनिक अधिकारी लक्ष्मण सिंह राणा कहते हैं कुछ एम्बुलेंसों में तकनीकी फाल्ट आने से सड़क पर नहीं चल सकी। फ्यूल को भी दूर कर दिया जाएगा। रहा प्रश्न निजीकरण का वे सेवा के सुधार के लिए किया गया सरकार का नीतिगत फैसला था।

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