अस्पतालों में एंटी रैबीज के बाद अब हीमोफीलिया के इंजेक्शनों का टोटा -केंद्र और दिल्ली सरकार के अस्पतालों में तालमेल नहीं -हीमोफिलिक पेशेंट की दिक्कतें बढ़ी -मुफ्त में मिलने वाला टीका 5 से 6 हजार रुपये में खरीद कर लगवाने के लिए विवश है पेशेंट

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ज्ञानप्रकाश
नई दिल्ली , राजधानी के चुनिंदा अस्पतालों में ही एंटी रैबीज और हीमोफीलिया के टीका लगाने की व्यवस्था है, इनमें से कई अस्पतालों में एंटी रैबीज वैक्सीन के साथ ही अब हीमोफीलिया के इंजेक्शनों की कमी से मरीज परेशान हैं। दिल्ली के कई अस्पतालों में मरीजों को इस बीमारी में लगने वाले फेक्टर नौ के इंजेक्शन उपलब्ध न होने से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। शास्त्री नगर निवासी राहुल को हीमोफीलिया के इंजेक्शन नियमित रूप से हर माह लोकनायक अस्पताल में लगाए जा रहे हैं। लेकिन बीते दो माह से यहां हीमोफीलिया का टीका नहीं मिल पा रहा है। डाक्टरों ने उन्हें पहले जीटीबी फिर डीडीयू अस्पताल में टीका लगवाने के लिए भेजा लेकिन उन्हें वहां मायुसी ही लगी। एम्स और सफदरजंग, आरएमएल में नये मरीजों को टीका लगवाने के लिए नए सिरे से मरीज को कई तरह की जांच जरूरी है। ऐसी हालत में उसे टीके तब तक नहीं लगाए जाते हैं जब तक इन अस्पतालों में बने आईसोलेशन यूनिट के प्रमुख संतुष्ट नहीं हो जाते हैं। अनुमान है कि दिल्ली सरकार के तीन अस्पतालों में 1523 हीमोफिलिक पेशेंट पंजीकृत है।
केंद्र और दिल्ली सरकार के अस्पतालों में तालमेल नहीं:
दिक्कत वाले तथ्य ये हैं कि दिल्ली सरकार के लोकनायक अस्पताल, जीटीबी अस्पताल, दीन दयाल उपाध्याय में ही ये इंजेक्शन मिलते हैं और इन सभी अस्पतालों में ये जरूरी इंजेक्शन पिछले कुछ दिनों से उपलब्ध नहीं हैं। जिन तीन अस्पतालों में इंजेक्शन उपलब्ध है वे आरएमएल, एम्स, सफदरजंग है, जो केंद्र सरकार के अंतर्गत परिचालित हैं। उनके अपने अलग रूल है। इस वजह से दिल्ली सरकार के अस्पतालों में पंजीकृत हीमोफिलिक पेशेंट को टीका नहीं लगा पा रहा है। मरीजों का कहना है कि बाजार में इसकी कीमत करीब 5 से 6 हजार प्रति इंजेक्शन आती है। जो लगवाना उनके बस की बात नहीं है। यह कुछ मरीजों में हर 15 दिन पर लगाया जाता है जबकि कुछ मरीजों को हर सप्ताह के अंतराल में लगाया जाता है। हीमोफीलिया ए और बी दो तरह का रोग होता है। हीमोफीलिया ए के कारण खून में फैक्टर 8 तो बी में फैक्टर 9 की कमी होती है। इसके कारण खून का थक्का जमने की आशंका रहती है।
शरीर से खून बहने पर रु कता नहीं:
हीमोफिलिया बच्चों को माता-पिता से विरासत में मिलने वाली बीमारी है। इसमें अगर शरीर से खून बहने लगता है तो फिर रु कता नहीं है। इस कारण चोट या दुर्घटना में यह जानलेवा साबित होती है। निजी अस्पतालों या डाक्टरों के यहां इसका इलाज काफी महंगा है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में यह निशुल्क है। इस बीमारी के मरीज को इंजेक्शन, दवा के अलावा खून भी नि:शुल्क मिलता है।
अधिकतर लोगों को चोट लगने पर चलता है पता :
हीमोफिलिया बीमारी दो तरह की होती है, हीमोफिलिया ए और हीमोफिलिया बी। इस बीमारी पर तब तक लोगों का ध्यान नहीं जाता जब तक कि उन्हें किसी कारण से गंभीर चोट न लगे या उसमें रक्त न रु के। हीमोफिलिया ए के मरीज 10 हजार में से एक होते हैं, जबकि बी का मरीज 40 हजार में एक होता है। एम्स के प्रोफेसर डा. नवल विक्रम के अनुसार इस रोग में रक्त में एक प्रोटीन की कमी होती है, जिसे क्लॉटिंग फैक्टर कहा जाता है। इस फैक्टर की विशेषता यह है कि यह बहते हुए रक्त के थक्के जमाकर उसका बहना रोकता है। यह बीमारी रक्त में थ्राम्बोप्लास्टिन नामक पदार्थ की कमी से होती है।
जल्द होगी आपूर्ति:
दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सचिव संजीव खिरवाल ने कहा कि टीका की खरीद संबंधी फाइल किन्हीं कारणों से वित्त विभाग में लंबित थी जिसे पास कर दिया गया है। अगले सप्ताह टीकों की आपूर्ति कर ली जाएगी। मरीजों को हो रही दिक्कतों से बचने के लिए अस्पताल प्रशासन को हिदायत दी गई है कि वे इंजेक्शन बाजार से खरीद कर लगवाए, मरीज का बिल सरकार को भेजे।

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